Saturday, August 19, 2017

खिड़कियाँ आज भी खुलती हैं

खिड़कियाँ आज भी खुलती हैं,
पर वो पहले वाली बात कहाँ?

वो एक हशीन रात थी,
अब मेरे नशीब में वैसी रात कहाँ ?

यूं तो मिलने को रोज मिलते हैं,
तबियत मिले वो मुलाकात कहाँ ?

फ़र्क दिन-रात का हुआ मुश्किल है,
सुकून से सो सकू वो रात कहाँ ?

क्योंकर सुनेंगे किस्से दादी-नानी के,
आज के बच्चों में ज़ज्बात कहाँ ?

मौजूदा दौड़ में सभी दुल्हें हैं,
साथ चल सके अब वो बारात कहाँ ?

                   ...... ....... सूफ़ी ध्यान श्री

Sunday, June 5, 2016

जुदा होके उनसे आज मैं ख़ुदा हो गया

जुदा होके उनसे आज मैं ख़ुदा हो गया।
था जो ज़र्रा , वो अब आफ़ताब  हो गया।
खिसकी जमी और मैं आसमाँ हो गया।
 हैरत है कि 'अलीन' क्या से क्या हो गया ?

                                    अनिल कुमार 'अलीन'
                  










(चित्र गूगल इमेज साभार) 

Friday, September 11, 2015

हकीकत न दिखाओ मर जाऊंगा।

 





















यकीनन ख़ाक सहराओं की तूने उड़ा रक्खी होगी,
मेरी तन्हाई ऐसे किसी तिनके की मोहताज़ नहीं।
---सूफी ध्यान श्री

मुद्दतोँ बाद ख्वाब आँखों से ओझल हुए हैं यारों
ज़माने की हकीकत न दिखाओ मर जाऊंगा।
-----सूफ़ी ध्यान श्री

बड़ी मुश्किल से नींद से जागा हूँ यारों
ख्वाब न दिखाओ फिर से सो जाऊँगा।
.........सूफ़ी ध्यान श्री

भला क्योंकर न हो,
उन्हें उजालों से परहेज
जो रात के साये में जीते हैं।
कुछ अजीब हैं शख्स वे
जो गिरवी रखकर इमान,...
मर्यादा के मुखौटे में जीते हैं।
----सूफ़ी ध्यान श्री

फ़साने ही फ़साने हो जहाँ हरेक फ़साने पे।
फिर मुश्किल है जुगल बंदी वहाँ जुबानों पे।। ----सूफी ध्यान

खो जाए वजूद फिर वो अपना क्या?
जुड़ा रहे खुदी से फिर उसका क्या?
अपने वजूद की दुनिया बस इतनी है,
पानी पर पानी लिखनी जितनी है।
----सूफी ध्यान श्री

क्योंकर ख्वाब आये पलकों की दहलीज पर,
जब आँखों की नींद तक चुरा गया है कोई।
हर वक़्त ढूढ़ता रहता हूँ खुद को, खोकर उसमे
जब से पराया कह कर अपना बना गया है कोई।।
-----सूफी ध्यान श्री

Monday, August 17, 2015

खुद का भ्रम बहुत है

खुद का भ्रम बहुत है ख़ुदा के होने के लिए।
ख़ुदा का भ्रम पैदा न कर खुद के होने के लिए।
............अनिल कुमार 'अलीन'.............

 

Sunday, August 9, 2015

तुम्हारी रचनाएँ तुम्हारी ही तरह झूठी है

गर लाइक करते हो कि मैं भी करूँगा एक दिन,
फिर तो थक जाओगे एक दिन यूँ ही करते-करते।

तुम्हारे जिन्दा होने की सबब गर कुछ हो तो लू
कमबख्त यहाँ साँस भी लेते हो तो डरते-डरते।

वक्त रहते बंद करो साहित्य में खुद को गिराना
वरना मर जाओगे एक दिन यूँ ही मरते-मरते ।

लाख ढक के रखो मर्यादा में इस गंदगी को  तुम
ऊब जाओगे एक दिन खुद से इसे करते-करते।

तुम्हारी रचनाएँ तुम्हारी ही तरह झूठी है अलीन
कीड़े पड़ जायेंगे इसमें विचारों के ठहरते-ठहरते।
                                                                                       ……अनिल कुमार 'अलीन'……  

Thursday, August 6, 2015

मसीहा मोहब्बत का

वीराने में,
ज़िन्दगी से थका,
हारा,
सो रहा था,
लम्बी नींद में,
वह मसीहा,

मोहब्ब्बत का ,
मोहब्बत में,
जाने किसके.

वह विराना,
जो गवाह है,
चंद चीखों
और सैकड़ों प्रहारों के,
जो पड़े थे कभी,
ख़ामोशी पे जिसके.

सर कुचलने वाले,
अपनी बदसलूकी
और बेरहमी पर,
सर झुकाए,
खड़े थे,
आगे जिसके,
गवाह थे,
बेगुनाह होने के उसके.

मोहब्बत का मसीहा

वह,

रात की ख़ामोशी,
जीने की चाह,
पर दर्द भरी आह,
आह,
जिसे सुनकर,
सितारे भी,
अश्क बहाए,
नभ के.

दुआएं,
लाखों लबों की,
कुबूल होती वहाँ,
जहाँ पड़ी,
एक अधूरी दुआ,
लब पे जिसके.

यक़ीनन,
जिंदगी से,
वो नहीं,
बल्कि जिंदगी,
हारी उससे,
अबतलक,
पूरी कायनात,
दोषी है जिसके

अनिल कुमार ‘अलीन’

Saturday, August 1, 2015

अदब बादलों की

 

 

 

 

 

यह अदब है बादलों की, तुझे भिगोने की 'अलीन'

बरसती बूंदों से खुद को छुपाने की गुस्ताखी न कर।

............अनिल कुमार 'अलीन'.............


शराब ऐसी हो कि चढ़कर न उतरे ता-उम्र।
उतर जाए समय के साथ फिर वो शराब नहीं।

............अनिल कुमार 'अलीन'.............