Tuesday, July 14, 2015
Monday, July 13, 2015
क्या दिन थे वे भी
1.
क्या दिन थे वे भी भीग जाते थे बारिश से,
अब दिन हैं ये भी जल उठते हैं बारिश से।
2.
यह वही मौसम हैं, बारिश है और मैं भी 'अलीन'
पर खुद को छुपाता जिससे वो मेरा छत नहीं।3.
अब तो जी में आता है कूद मरु इस बालकनी से,
बारिश भी पराया हुआ जो कभी अपना था.
3.
अब तो मेरे दुःख, मेरे दर्द ही अपने हैं 'अलीन'
वो साँसे छोड़ गयी बाबू जी को जिसे जपना था।
.. ....अनिल कुमार 'अलीन'.......
क्या दिन थे वे भी भीग जाते थे बारिश से,
अब दिन हैं ये भी जल उठते हैं बारिश से।
2.
यह वही मौसम हैं, बारिश है और मैं भी 'अलीन'
पर खुद को छुपाता जिससे वो मेरा छत नहीं।3.
अब तो जी में आता है कूद मरु इस बालकनी से,
बारिश भी पराया हुआ जो कभी अपना था.
3.
अब तो मेरे दुःख, मेरे दर्द ही अपने हैं 'अलीन'
वो साँसे छोड़ गयी बाबू जी को जिसे जपना था।
.. ....अनिल कुमार 'अलीन'.......
Sunday, July 12, 2015
माँगना गर है
माँगना गर है तो माँग खुदा से सर उठाकर तू
खुद को गिराकर यूँ हर किसी को सलाम मत कर।
चले हो सफ़र में तो बारिश भी होगी और तूफान भी
मंज़िल पाने से पहले अपना मुकद्दर किसी के नाम मत कर।
खुद को गुनाहगार न समझ मुझ तक आते-आते,
यह जो साजिश है अंधेरों की उसे सरेआम मत कर।
सर की छत जो टूटकर आ गयी तेरे हाथों में,
इलज़ाम अपना मासूम परिंदों के नाम मत कर।
बड़ी मुश्किल से निकलते हैं लोग यहाँ अपने घरों से,
मुझे बेघर ही रहने दे कोई कोई छत नाम मत कर।
.........अनिल कुमार 'अलीन'.....
Friday, July 10, 2015
Tuesday, June 9, 2015
वो निहायत ही झूठे है व मक्कार है
१.
क्योंकर यह सितम तुम्हारे साथ होना था,
कि तुम्हारे घर पे आग की वर्षात होना था।
कभी मिले वो मगरूर बदल तो पूंछेंगे,
प्यासी भूमि पे क्या यही इन्साफ होना था?
२.
गर यकीं है खुद बहुत
तो चलो बादलो को ललकार आये।
कि हम सीने पे नहीं दिल पे खाएंगे
बशर्ते वो आग नहीं
कि हम सीने पे नहीं दिल पे खाएंगे
बशर्ते वो आग नहीं
अबकी बार शोला बनकर आये।
३.
बड़ी आस लिए फिरते हो उसके साथ का,
बड़े नादाँ हो जो खुद पे भरोसा छोड़ आये हो।
बड़े नादाँ हो जो खुद पे भरोसा छोड़ आये हो।
४.
सब कुछ हार के मुहब्बत में जो निःशब्द हो गए,
उनकी ख़ामोशी ही जुबां है गर पढ़ सको तो पढ़ो।
कहाँ तक लाज़िम हैं उन्हें बेवफा कहना अलीन,
दिल की बाते हैं दिल से समझ सको तो पढ़ो।
उनकी ख़ामोशी ही जुबां है गर पढ़ सको तो पढ़ो।
कहाँ तक लाज़िम हैं उन्हें बेवफा कहना अलीन,
दिल की बाते हैं दिल से समझ सको तो पढ़ो।
५.
आ मिल ले जो मुझसे मिलने की ख्वाइश है,
तुम्हारी नहीं, यह वक्त की आजमाइश है।
ख्याल जो भी पाल रखा है मुझको लेकर,
सफ़ेद झूठ है न सच की कोई गुन्जाइश है।
तुम्हारी नहीं, यह वक्त की आजमाइश है।
ख्याल जो भी पाल रखा है मुझको लेकर,
सफ़ेद झूठ है न सच की कोई गुन्जाइश है।
६.
मुझे देखकर जाती रहेगी गलत फहमी तेरी।
अबतलक लोगों को मिलकर मुझसे
अबतलक लोगों को मिलकर मुझसे
एक बस यही बात समझ आई है।
अलीन कोई कयामत है या फिर
कोई बला आई है।
लाख कर ले जतन मुझे जकड़ने की,
कहाँ कोई परछाई पकड़ में आई है।
बिछा ले तेरे जी में आये जितने प्यादे,
एक चाल हूँ ऐसा जो अब तक समझ न आई है.
अलीन कोई कयामत है या फिर
कोई बला आई है।
लाख कर ले जतन मुझे जकड़ने की,
कहाँ कोई परछाई पकड़ में आई है।
बिछा ले तेरे जी में आये जितने प्यादे,
एक चाल हूँ ऐसा जो अब तक समझ न आई है.
७.
कभी दर्द बेचकर हमने दवा खरीदनी चाही।
सुबह से शाम हो गयी और
फिर युहीं जिंदगी तमाम हो गयी,
न गुजरा इधर से कोई खरीददार न कोई राही।
सुबह से शाम हो गयी और
फिर युहीं जिंदगी तमाम हो गयी,
न गुजरा इधर से कोई खरीददार न कोई राही।
८.
वो दर्द अपना बेचने को अब भी तैयार है,
बशर्ते बिना दर्द का कोई खरीदार हो।
वो निहायत ही झूठे है व मक्कार है,
बशर्ते बिना दर्द का कोई खरीदार हो।
वो निहायत ही झूठे है व मक्कार है,
जो कहते हैं एक अलीन ही यहाँ बीमार है।
९.
क्या कहते हो मियां.....
फिर तो यक़ीनन उसकी जान पर आई है
तबियत का मारा है जो ख़ामोशी छाई है।
फिर तो यक़ीनन उसकी जान पर आई है
तबियत का मारा है जो ख़ामोशी छाई है।
१०.
मुझे यकीं था तुममे से कोई आएगा,
पत्थर मारकर घर में छुप जायेगा।
पत्थर मारकर घर में छुप जायेगा।
११.
अब हमने भी ठान रखी है
कि आग पर अपनी जान रखी है।
देखता हूँ कब तक छिपेगा अपने शीशे के मकां में,
अब तो हाथों में हमने पत्थर उठा रखी है।
कि आग पर अपनी जान रखी है।
देखता हूँ कब तक छिपेगा अपने शीशे के मकां में,
अब तो हाथों में हमने पत्थर उठा रखी है।
१२.
अब हमने भी ठान रखी है
कि आग पर अपना आन रखी है।
देखता हूँ कब तक छिपेगा अपने शीशे के घर में,
अब तो हाथों में हमने पत्थर उठा रखी है।
कि आग पर अपना आन रखी है।
देखता हूँ कब तक छिपेगा अपने शीशे के घर में,
अब तो हाथों में हमने पत्थर उठा रखी है।
१३.
मैं तो कुछ और ही हूँ जबकि कुछ और तू समझ बैठा,
हाय अल्लाह तूने धधकते आग को पानी समझ बैठा।
हाय अल्लाह तूने धधकते आग को पानी समझ बैठा।
१४.
अभी लूट हमारी देखी ही कहाँ हैं तूने,
जिधर से गुजरता हूँ वो बस्ती कभी बसती नही।
जिधर से गुजरता हूँ वो बस्ती कभी बसती नही।
……....... अनिल कुमार 'अलीन'…………
Monday, June 8, 2015
वो एक आइना जिसमे खुदा का नूर रहता हैं।
1.
आईना होकर भी वो खुद से दूर रहता है,
खुद को न पाकर खुद में, मजबूर रहता हैं।
खुद को देखने के लिए उसी को देखते हो तुम,
वो एक आइना जिसमे खुदा का नूर रहता हैं।
2.
जिन राहों से होकर लोग पा लेते हैं अपनी मंजिलें,
उन्हीं राहों में कहीं खुद को ढूढ़ता हूँ मैं.
३.
क्योंकर यह सितम तुम्हारे साथ होना था,
तुम्हारे दामन में आग की वर्षात होना था।
कभी मिले वो मगरूर बादल तो हम पूंछेंगे,
प्यासी बंजर भूमि पे क्या यही इन्साफ होना था?
4.
किसको पड़ी है साफ़ करने की गली की गंदगी,
वो फरिश्ता ही था जो सब साफ़ कर दिया।
हमारे गुस्ताखियों की सजा हमको मिली इस तरह,
इलज़ाम खुद पर लेकर वो हमे माफ़ कर दिया.....
5.
मुहब्बत कर ली फिर तो
बात खुलने से क्या डरना?
जब तबियत ही है अपनी,
धड़कते आग से खेलना.........
......… अनिल कुमार 'अलीन'……।
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