Tuesday, May 19, 2015
Monday, May 18, 2015
जज्बात 2
१.
इन बहारों से इतनी दिल्लगी क्यों।
जब उम्मीदें वफ़ा नहीं रखते।
२.
जब हरेक पतझड़ के बाद बहार आनी है।
फिर क्यों न दरख्तों दीवार बदलतें यारों.
३.
वो साहस ही क्या जो मौसम का मिजाज़ न देख सके।
हमने तो बंजर भूमि में अंकुरित बीजों को देखा है।
4.
वो साहस ही क्या जो मौसम का मिजाज़ न देख सके।
हमने तो बंजर भूमि में अंकुरित बीजों को देखा है।
5.
होरी का भटकना इस बात का साक्षी है कि जीवन उसमे बाकी है
वरना मौसम के भय से मिटटी में दफन हो जाना.
6.
फूल बने ही है खिलने, मुस्कुराने और गिर मिटटी में मिल जाने को
ताकि फिर से किसी पौधे की मुस्कान बन सके।
. ..........अनिल कुमार 'अलीन'..........
इन बहारों से इतनी दिल्लगी क्यों।
जब उम्मीदें वफ़ा नहीं रखते।
२.
जब हरेक पतझड़ के बाद बहार आनी है।
फिर क्यों न दरख्तों दीवार बदलतें यारों.
३.
वो साहस ही क्या जो मौसम का मिजाज़ न देख सके।
हमने तो बंजर भूमि में अंकुरित बीजों को देखा है।
4.
वो साहस ही क्या जो मौसम का मिजाज़ न देख सके।
हमने तो बंजर भूमि में अंकुरित बीजों को देखा है।
5.
होरी का भटकना इस बात का साक्षी है कि जीवन उसमे बाकी है
वरना मौसम के भय से मिटटी में दफन हो जाना.
6.
फूल बने ही है खिलने, मुस्कुराने और गिर मिटटी में मिल जाने को
ताकि फिर से किसी पौधे की मुस्कान बन सके।
. ..........अनिल कुमार 'अलीन'..........
Sunday, May 17, 2015
जज्बात
१.
दोस्ती करने की बात नादानी है,
नफरत करने की बात बेईमानी है।
गुस्सा करने की बात शैतानी है,
प्यार करने की बात बचकानी है।
क्योंकि...
दोस्ती और प्यार कभी किया नहीं जाता,
यह अलग बात है कि गर हो गया
तो फिर रहा नहीं जाता।
और जहाँ यह दोनों है
वहाँ नफरत और गुस्सा हो नहीं सकता।
दोस्ती जैसे ओंस की बूँदें
जो शुष्क धरा को नम करती है।
और प्यार एक इबादत
जो एक रूह से होकर दूसरे रूह तक जाता।
२. नफरत करने की बात बेईमानी है।
गुस्सा करने की बात शैतानी है,
प्यार करने की बात बचकानी है।
क्योंकि...
दोस्ती और प्यार कभी किया नहीं जाता,
यह अलग बात है कि गर हो गया
तो फिर रहा नहीं जाता।
और जहाँ यह दोनों है
वहाँ नफरत और गुस्सा हो नहीं सकता।
दोस्ती जैसे ओंस की बूँदें
जो शुष्क धरा को नम करती है।
और प्यार एक इबादत
जो एक रूह से होकर दूसरे रूह तक जाता।
और हम इतने अक्लमंद तो नहीं पर जिस उलझन को देख ले सुलझ जाती है।
३.
जब गुरुर होना खुद पे आम बात है,
फिर भला चाहत तुम्हारी खास कैसे?
नहीं तुम कोई फरेबी हो, चाहत हो नहीं सकते।
चाहत तो इबादत है, इबादत है......
भला इबादत में गुरुर कैसे?......
४.
यदि गुरुर-ए-इश्क है अब भी दुनिया में ,
तो उससे जाकर कह दे कोई,
अब भी जिन्दा है इश्क उसकी चाह में मरने को ।
५.
अजीब बात है हँसते हुए चेहरे और शराबी आखों की,
कि वो नबाबी शान और दोस्तों के लिए जान रखता है।
क्योंकर कोई ऐतबार करे कोई उसकी बातोँ पर 'अलीन'
क्या कोई समंदर में भी सैलाब रखता है.....
५.
कैसे कोई चाहे हकीम-ए-मुहब्बत को,
जन्नत मिलता है यहाँ बीमार हो जाने पर।
ढूढ़ तो लाऊ हकीम एक तेरे खातिर,
पर वो भी बीमार हो जायेगा यहाँ आने पर।....
………… अनिल कुमार 'अलीन'…………
जब गुरुर होना खुद पे आम बात है,
फिर भला चाहत तुम्हारी खास कैसे?
नहीं तुम कोई फरेबी हो, चाहत हो नहीं सकते।
चाहत तो इबादत है, इबादत है......
भला इबादत में गुरुर कैसे?......
४.
यदि गुरुर-ए-इश्क है अब भी दुनिया में ,
तो उससे जाकर कह दे कोई,
अब भी जिन्दा है इश्क उसकी चाह में मरने को ।
५.
अजीब बात है हँसते हुए चेहरे और शराबी आखों की,
कि वो नबाबी शान और दोस्तों के लिए जान रखता है।
क्योंकर कोई ऐतबार करे कोई उसकी बातोँ पर 'अलीन'
क्या कोई समंदर में भी सैलाब रखता है.....
५.
कैसे कोई चाहे हकीम-ए-मुहब्बत को,
जन्नत मिलता है यहाँ बीमार हो जाने पर।
ढूढ़ तो लाऊ हकीम एक तेरे खातिर,
पर वो भी बीमार हो जायेगा यहाँ आने पर।....
………… अनिल कुमार 'अलीन'…………
Sunday, September 7, 2014
Wednesday, May 14, 2014
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